पिछला भाग पढ़े:- मेरी पहली कहानी: एक पारिवारिक किस्सा-1
हिंदी सेक्स कहानी अब आगे-
पापा ने टॉर्च बंद कर दी और कमरा एक बार फिर उस घने अंधेरे में डूब गया, जहाँ सिर्फ बाहर हो रही बारिश की आवाज़ सुनाई दे रही थी। मम्मी अब भी पापा के पैरों की मालिश कर रही थी। लेकिन अब उनकी आवाज़ में एक अलग तरह की शरारत और नज़दीकी थी।
मम्मी ने बिल्कुल धीमी, दबी हुई आवाज़ में कहा, “जान, आप अपना अंडरवियर भी खोल दीजिए, मैं आपकी ‘तीसरी टांग’ की भी मालिश कर देती हूँ।” उनकी बातों में एक अजीब सी बेबाकी थी। उन्होंने आगे बढ़ते हुए फुसफुसा कर कहा, “आपकी यह तीसरी टांग तो बिल्कुल मूसल की तरह सख्त है। तीन बच्चे हो जाने के बाद भी, मुझे आज भी इससे दर्द होता है।”
मम्मी की ये बातें सुन कर मेरे और रानी के कान जैसे सुन्न हो गए। उस रात के सन्नाटे में मम्मी के शब्दों का अर्थ हमारे मन के लिए बहुत भारी और चौंकाने वाला था। बिस्तर पर बिल्कुल स्थिर लेटे हुए, मैं और रानी बस एक-दूसरे की सांसें महसूस कर रहे थे, यह जानते हुए भी कि हम दोनों जाग रहे हैं। उस अंधेरे में, माता-पिता का वह निजी संसार हमारे सामने अपनी एक अलग ही परत खोल रहा था।
मम्मी की आवाज़ में अब एक अजीब सी जोश और तैयारी थी। उन्होंने फुसफुसाते और कांपते हुए कहा, “इसमें अच्छे से तेल लगा देने से, मैं इसे आसानी से अपने बुर के भीतर समा पाऊंगी।” उस समय मैं और रानी पूरी तरह अनजान थे कि आखिर ये किस तरह की ‘समा जाने’ वाली बातें हो रही हैं। लेकिन उस घोर अंधेरे में, हमारे भीतर डर से ज्यादा उत्सुकता और उत्साह भरा हुआ था। हम सांसें रोक कर बस हर एक शब्द को अपने भीतर उतार रहे थे।
तभी मेरे दिमाग में वो बातें घूमने लगी, जो अक्सर मोहल्ले के दोस्त कॉलेज या खेल के मैदान में किया करते थे। मेरे कुछ दोस्तों ने बड़े रहस्यमयी अंदाज़ में बताया था कि, “रात को सभी के मम्मी-पापा एक अजीब तरह की लड़ाई करते हैं और उसे चोदा-चोदी का खेल कहते हैं। पापा रात के अंधेरे में मम्मी को मारते-पीटते हैं और मम्मी कराहती हैं।”
मेरे नन्हे दिमाग में द्वंद्व चल रहा था—एक तरफ पापा का वो प्यार भरा शब्द ‘जान’ और मम्मी की वो शरारती हंसी थी, और दूसरी तरफ दोस्तों की बताई हुई वो ‘मार-पिटाई’ वाली बात। मैं समझ नहीं पा रहा था कि जो मैं सुन रहा हूँ, वो प्यार है या उस ‘लड़ाई’ की शुरुआत, जिसका जिक्र दोस्तों ने किया था। हम दोनों बस बुत बने लेटे रहे, यह जानने के लिए कि अब आगे क्या होने वाला है।
बाहर बारिश का शोर अब थम चुका था, लेकिन ठंडी हवाएं अब भी पेड़ों से टकरा कर एक अजीब सी सरसराहट पैदा कर रही थी। कमरे के भीतर वही गहरा सन्नाटा था, जिसे अचानक बिजली के एक झटके ने तोड़ दिया। बिजली बस कुछ ही पलों के लिए आई और फिर चली गई, लेकिन उन चंद सेकंडों की रोशनी ने मेरे सामने एक ऐसा दृश्य खोल दिया जिसने मुझे सुन्न कर दिया।
मैंने अपनी आँखें बिल्कुल धीरे से, नाममात्र के लिए खोल रखी थी। जो मैंने देखा, उस पर मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। मेरे नन्हे दिमाग में बस एक ही सवाल कौंध रहा था—”वे ऐसा क्यों कर रहे हैं?”
मम्मी और पापा एक-दूसरे से पूरी तरह भिड़े हुए थे। मेरे दोस्तों ने तो मुझे यह बताया था कि रात की इस ‘लड़ाई’ में हमेशा पापा ही मम्मी के ऊपर चढ़ कर उन्हें मारते-पीटते हैं। लेकिन यहाँ तो नज़ारा बिल्कुल उलट था! उस क्षणभंगुर रोशनी में मैंने देखा कि मम्मी, पापा के ऊपर चढ़ कर उस ‘लड़ाई’ की तैयारी कर रही थी।
मेरे लिए यह दृश्य जितना डरावना था, उतना ही चकित कर देने वाला भी। क्या यह वही ‘मार-पिटाई’ थी जिसका ज़िक्र मेरे दोस्त करते थे? या फिर यह कोई ऐसा खेल था जिसे सिर्फ बड़े ही जानते थे? उस घुप अंधेरे में, बिजली के जाने के बाद भी वह छवि मेरी आँखों के सामने तैर रही थी और मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था।
बिजली के जाने के बाद कमरा फिर से स्याह अंधेरे में डूब गया, लेकिन उस चंद सेकंड की रोशनी ने मेरी बहन रानी को बुरी तरह डरा दिया था। वह सहम कर धीरे से खिसकी और डर के मारे मुझसे चिपक गई। मैंने भी बड़े भाई का फर्ज निभाते हुए उसे अपने आगोश में समेट लिया। हम दोनों ने वह पतली सी चादर ऊपर तक तान ली। लेकिन वह चादर इतनी महीन थी कि उसके आर-पार कमरे की धुंधली आकृतियां अब भी साफ दिखाई दे रही थी।
बाहर हवा का शोर कम हो चुका था।लेकिन कमरे के भीतर एक अलग ही तरह का ‘गुंजन’ शुरू हो गया था। मम्मी की वह धीमी सिसकारी और उनके गले से निकलने वाली आवाज़ें उस शांत कमरे में रह-रह कर गूँज रही थी। उन आवाज़ों के साथ उनकी पायल की रुन-झुन एक खास लय में सुनाई दे रही थी, जैसे कोई संगीत बज रहा हो।
तभी अचानक, बादलों के बीच से आसमान की बिजली कड़की! उस कड़क ने एक पल के लिए पूरे कमरे को दिन की तरह प्रकाशित कर दिया। उस तीव्र रोशनी में मैंने जो देखा, वह किसी बच्चे के लिए अकल्पनीय था। मम्मी पापा के लंड पर चढ़ कर और दोनों हाथों को पापा के सीने पर रख कर अपनी कमर को उठा-पटक कर रही थी और सिसकारी भर रही थी। मम्मी और पापा एक-दूसरे में पूरी तरह खोए हुए थे, और उनकी वह कामुक मुद्रा उस रोशनी में किसी सजीव मूर्ति की तरह चमक उठी।
मेरे और रानी के लिए वह ‘लड़ाई’ नहीं, बल्कि एक ऐसा रहस्य था जिसे हम समझ नहीं पा रहे थे, लेकिन जिसकी तीव्रता को हम साफ़ महसूस कर रहे थे। हमारे दिल तेज़ी से धड़क रहे थे और हम चादर के भीतर ही एक-दूसरे को कस कर पकड़े हुए थे।
कमरे का वातावरण अब पूरी तरह बदल चुका था। बाहर की आंधी थम गई थी, लेकिन कमरे के भीतर भावनाओं का एक अलग ही ज्वार उठ रहा था। पापा की आवाज़ में एक अजीब सा जोश और अधिकार था। उन्होंने बिल्कुल धीमी लेकिन भारी आवाज़ में मम्मी से कुछ ऐसा कहा जो मेरे और रानी के लिए बिल्कुल नया था—”मेरी कुतिया, मुझे तेरा बुर का अमृत पीना है।”
उस शब्द और उस लहजे ने हमें अंदर तक झकझोर दिया। हमने देखा कि पापा ने मम्मी को बिस्तर पर सीधा लिटाया और फिर जो हुआ, उसने हमें अवाक कर दिया। मम्मी की टांगों को फैला कर पापा कुछ ऐसा करने लगे जिसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वे कुछ ‘चाट’ रहे हों। उस सन्नाटे में वह चप-चप की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।
तभी, जैसे किस्मत हमें और भी करीब से दिखाना चाहती थी, बिजली वापस आ गई। हालांकि वह वोल्टेज कम होने के कारण मद्धम थी, लेकिन उस पीली रोशनी ने पूरे मंजर को हमारे सामने साफ कर दिया। मैं और रानी, अपनी आधी खुली आँखों से, सांसें रोक कर यह सब देख रहे थे। हमारे भीतर डर और घबराहट तो थी ही, पर उससे कहीं ज्यादा एक अजीब सी उत्सुकता थी।
हम दोनों पत्थर की तरह ठंडे पड़ गए थे, पर हमारी नज़रें उस बिस्तर पर टिकी थी जहाँ हमारे ‘हीरो’ जैसे पापा और ‘सुंदर’ मम्मी एक ऐसी क्रिया में लीन थे, जो हमारे छोटे से संसार की समझ से बिल्कुल परे थी।
आगे की कहानी अगले पार्ट में।