प्रेषिका : कौसर सम्पादक : जूजाजी मैं फिर करीब 05-30 बजे उठी तो शाम की फिर चिंता होने लगी कि आज ससुर जी को चाय कैसे देने जाऊँ। उनकी बात बार-बार याद आ जाती थी कि शाम को मैं उनके पास नंगी होकर चाय देने जाऊँ। तभी ससुरजी खुद मेरे रूम में आ गए। बोले- बहू.. अब तबियत कैसी है ? मैंने कहा- अभी ठीक है, मैं वो चाय लेकर आने वाली थी ड्राइंग रूम में! यह मैंने डरते हुए कहा। ससुर जी- बेटा.. कोई बात नहीं, तेरी तबियत ठीक नहीं है, तू आराम कर ले और तू इस टॉप में सुंदर लग रही है। ऐसे ही रहना बस..! ये कह कर वो चले गए। मैं उस टॉप में सच में अच्छी लग रही थी। वो सफ़ेद टॉप था उसमें मेरे बोबे एकदम खड़े लग रहे थे और टॉप मेरे जिस्म से एकदम चिपका हुआ था। मैंने नीचे पजामा पहन रखा था। मैं समझ गई कि ससुरजी क्या कहना चाहते हैं, वो शायद आज कुछ ना करें। मेरी तबियत भी अब ठीक लग रही थी। मैं सीधी रसोई में गई और खाना बनाने लगी। फिर शाम को खाना ससुर जी के साथ ही खाया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, मेरे से मेरी तबियत के बारे में पूछा और फिर अपने कमरे में सोने चले गए। इस तरह दो दिन बीत गए, उन्होंने इन दो दिनों में मेरा पूरा ख्याल रखा, मुझे भी उनका मेरा ऐसे ख्याल रखना अच्छा लग रहा था। आज शनिवार था, हमारे यहाँ शनिवार को सब्ज़ी की मंडी लगती है, तो सुबह ससुरजी बोले- बहू, आज बाजार चलना है, तो तू अच्छी सी साड़ी पहन लेना, आज सब्ज़ी लानी है ना! तो मैं अपने कमरे में आ गई और तभी पीछे-पीछे ससुर जी भी आ गए- बहू… आज मैं तेरे लिए साड़ी पसन्द करूँगा! उन्होंने मेरी अलमारी खोली और मेरे कपड़े देखने लगे। उन्होंने एक गुलाबी रंग की साड़ी निकाली जो नेट वाली थी, वो मैंने शादी के समय ली थी। यह एक बहुत ही पारदर्शी साड़ी थी और उसका ब्लाउज तो बैकलैस था, पीछे केवल डोरी थी, मैंने सोचा कि ऐसी साड़ी पहन कर बाज़ार जाऊँगी तो बहुत अजीब लगेगा। मैंने कहा- बाबूजी… बाज़ार ही तो जाना है कोई सिंपल सी साड़ी पहन लेती हूँ… ससुर जी- नहीं, तू यही पहनेगी, चल पहन ले… मैं अभी आता हूँ। वे बाहर अपने कमरे में चले गए। मैं अपने कमरे में दरवाजा बन्द करके साड़ी बदलने लगी। तभी ससुरजी ने दरवाज़ा खटखटाया, मैं उस समय ब्रा और पैन्टी में थी। मैंने कहा- बाबूजी… ज़रा रुकिए, अभी आती हूँ। वो गुस्सा होकर बोले- यह बन्द क्यों किया है, खोल इसे..! मुझे डर लग गया, मैंने वैसे ही दरवाज़ा खोल दिया। वो मुझे ब्रा-पैन्टी में देख कर खुश हो गए। ‘तू अच्छी लग रही है..!’ मैंने नजरें झुका लीं। ससुर जी- चल यह पैन्टी उतार दे, मैं तेरे लिए दूसरी लाया हूँ..! मैंने देखा उनके हाथ में, नीले रंग का वाईब्रेटर, रिमोट, बेबी आयल और जो पैन्टी बैग में पड़ी थी, वो थी..! मुझे ये सब देख कर डर लग गया, मैंने कहा- बाबूजी प्लीज़, इससे बहुत दर्द होता है और हमको तो अभी बाज़ार जाना है ना..! मुझे लगा बाबूजी फिर आज सुबह-सुबह ही मेरे साथ वही करने जा रहे हैं जो दो दिन पहले किया था। बाबूजी- पागल, यह पैन्टी के अन्दर पहनने वाला वाईब्रेटर है और ये छोटा भी है, चल अपनी वो पैन्टी उतार दे। मुझे उनकी आँखों में गुस्सा दिखा, तो मुझे डर लगने लगा, पर मैंने सोचा कि इसे पैन्टी के अन्दर कैसे पहन सकते हैं? बाबूजी यह क्या कह रहे हैं? मैंने नजरें झुका कर अपनी पैन्टी उतार दी, वो बोले- चल अब थोड़ा झुक जा और टांगें थोड़ी फैला दे…! मैंने वैसा ही किया, उन्होंने बहुत सारा बेबी आयल लिया और मेरे गाण्ड वाली जगह लगा दिया। मुझे समझ आ गया- हाय अल्लाह… वो आज मेरे पीछे वाली जगह डालेंगे..! मैं काँप गई। उन्होंने कहा- हिलना मत !! और एक उंगली मेरी गाण्ड में डाल दी, बोले- वाह बहू… तेरी गाण्ड तो बड़ी ही मस्त है..! मुझे दर्द होने लगा, मैंने कहा- बाबूजी प्लीज़… दर्द हो रहा है… चलिए ना बाजार चलते हैं। अब उनकी उंगली बड़े आराम से मेरे अन्दर-बाहर होने लगी। तभी उन्होंने दो उंगलियाँ मेरे अन्दर डाल दीं। मेरी गाण्ड में पहली बार किसी ने कुछ डाला था। मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था। तभी उन्होंने वो नीले रंग का वाईब्रेटर मेरी गाण्ड के छेद पर रखा और हल्का-हल्का झटका देने लगे, वो अन्दर नहीं गया। उन्होंने एक तेज़ झटका मारा और करीब दो इंच वो मेरे गाण्ड में चला गया। मैं बहुत तेज़ चीखी, उन्होंने मुझे अपने बायें हाथ से पकड़ लिया और बोले- बस बेटा अब हो गया…! उन्होंने हल्के-हल्के करीब पूरा 6 इंच लम्बा वो वाईब्रेटर मेरे गाण्ड के छेद में घुसा दिया। मुझे दर्द होने लगा। मैंने कहा- बाबूजी बहुत दर्द हो रहा है। प्लीज़…! ससुर जी- चल बेटा, सीधी खड़ी हो जा। मैं बड़ी मुश्किल से सीधी खड़ी हुई, वो वाईब्रेटर अभी भी मेरे अन्दर था, पर ससुर जी ने हाथ हटा लिया था, तो दर्द नहीं हो रहा था। बस ऐसा लग रहा था जैसे मोटा से डंडा मेरे पीछे के छेद में डाल दिया हो। उन्होंने वो पैन्टी उठाई और मेरी टांगों के बीच रख कर मुझे पहनने लगे। उस पैन्टी में कुछ अड्जस्टमेंट करने का था, वो पैन्टी वाईब्रेटर के साथ जुड़ गई, अब वो वाईब्रेटर निकल नहीं सकता था। ससुर जी- चल अब तू अपना पेटीकोट और साड़ी पहन ले। अब बाजार चलते हैं। मैंने कहा- बाबूजी.. मैं तो हिल भी नहीं पा रही, मैं बाजार कैसे जाउंगी। प्लीज़ इसे निकाल दो मेरे अन्दर से…! वो कहते- कुछ नहीं होगा.. तू धीरे-धीरे चल सकती है.. चल, अब साड़ी पहन..! उन्होंने पेटीकोट, ब्लाउज और साड़ी पहनने में मेरी मदद की। वो वाईब्रेटर मेरी गाण्ड में एड्जस्ट हो गया था क्योंकि वो सिलिकॉन का था और मुझे दर्द भी नहीं हो रहा था। तभी ससुरजी ने कहा- अब रिमोट तो चैक कर लूँ ज़रा…! और रिमोट से वाईब्रेटर ऑन कर दिया, मुझे मेरी गाण्ड में एकदम गुदगुदी सी होने लगी, बड़ा अजीब एहसास था। मैंने कहा- बाबूजी… प्लीज़ बंद करो इसे… उफफ्फ़… उन्होंने वाईब्रेटर ऑफ कर दिया। कहते हैं- जा अब तैयार हो जा, दस मिनट में बाजार चलते हैं..! मैं अपने कमरे में ड्रेसिंग टेबल के सामने आ गई, मुझे लगा कि चलने में इतनी दिक्कत नहीं हो रही, जितनी मैं सोच रही थी। मैंने देखा कि मैं गुलाबी साड़ी में काफी सेक्सी लग रही थी, एकदम नई नवेली दुल्हन की तरह… साड़ी नेट वाली थी, तो मेरी कमर और नाभि दोनों नंगी दिख रही थीं। ब्लाउज भी पीठ की तरफ से नंगा था। मेरी कमर तो एकदम नंगी लग रही थी, आगे से भी मेरे मम्मे एकदम तने हुए थे और उनके बीच में काफ़ी दरार दिख रही थी। साड़ी मेरे जिस्म से एकदम चिपकी हुई थी, मेरे चूतड़ एकदम चुस्त लग रहे थे। मैंने थोड़ा मेकअप किया, अपने बाल बनाए, मैचिंग की चूड़ियाँ पहनी। हील वाली सैंडिल पहनी और फिर मैंने सर पर पल्लू भी कर लिया, जैसा बाबूजी कहते थे और फिर मैं ड्राइंग रूम में आ गई। बाबूजी मेरा इन्तजार कर रहे थे। बाबूजी- बड़ी सुंदर लग रही है बहू.. आज बाजार में मज़ा आएगा। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि तुझ जैसी शरीफ औरत की गाण्ड में वाईब्रेटर है इस समय और तू उसके मज़े ले रही है। मैंने ऐसे गंदे शब्द सुन कर अपनी आँखें नीची कर लीं और चुपचाप खड़ी रही। हम अपनी गाड़ी में बैठे और 15 मिनट में सब्ज़ी मंडी पहुँच गए। बाबूजी ने गाड़ी पार्क की दो बैग लिए और मेरे साथ बाजार में आ गए। ससुर जी ने मुझे दोनों बैग दे दिए और कहा- मैं तेरे पीछे रहूँगा, तू सब्ज़ी ले ले…! मैंने देखा ज्यादातर लोग मुझे ही देख रहे थे। क्योंकि मैं उस समय बहुत सेक्सी लग रही थी। मुझे लगा कुछ आदमी तो जानबूझ कर मुझे छूते हुए चल रहे थे। कोई कभी मेरी नंगी कमर पर हाथ लगाता हुआ जा रहा था, तो कोई मेरे चूतड़ों पर हाथ फिराता जा रहा था। बाजार में काफ़ी भीड़ थी, पर मेरा सारा ध्यान तो मेरे अन्दर जो वाईब्रेटर डाला हुआ था, उस पर था। और सब्ज़ी लेने का भी मन नहीं कर रहा था। ससुरजी ने मुझसे थोड़ी दूरी बनाई हुई थी पर वो भी साथ-साथ ही चल रहे थे। मैंने बाजार में घूम-घूम कर कुछ सब्ज़ियाँ खरीद लीं। तभी मुझे लगा उन्होंने रिमोट से वाईब्रेटर ऑन कर दिया, मुझे अपनी गाण्ड में गुदगुदी होने लगी। मैंने पलट कर देखा तो वो हल्के से मुस्करा रहे थे, मेरी हालत खराब होने लगी, मुझे अपने अन्दर सनसनी होने लगी, वो वाईब्रेटर मेरी गाण्ड में काफ़ी गुदगुदी कर रहा था। मुझे लगा कि घर की बात अलग थी, यहाँ पर मैं अपने को कैसे संभालूँ। तभी ससुर जी ने वाईब्रेटर की स्पीड बढ़ा दी, मेरी गुदगुदी से जान निकलने लगी, मुझे अपनी चूत में भी सनसनी होने लगी। मैं बाजार में कोई कोना देखने लगी, जहाँ मुझे कोई ज्यादा ना देख सके। मुझे एक गली में कुछ सब्ज़ी वाले खड़े दिखे, मैं वहीं चली गई। एक सब्ज़ी वाला मुझे देख कर बोला- माँ साब, लो बैंगन ले लो, बड़े लंबे-लंबे हैं… मुझे लगा कि यह शायद डबल मीनिंग में बोल रहा है क्योंकि वो मुस्कुरा रहा था। मैंने सोचा बैंगन क्या लूँ, जो वाईब्रेटर अभी लिया हुआ है उसे ही संभालना मुश्किल हो रहा है। मैं उसके ठेले पर हाथ रख कर खड़ी हो गई क्योंकि मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। ससुर जी वहीं आ गए- बहू… क्या हुआ? बैंगन लेने हैं क्या? मैंने देखा उनके हाथ में वो रिमोट था। उन्होंने एक बार और कुछ किया और मुझे लगा वाईब्रेटर की स्पीड और बढ़ गई है। मुझसे अब खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। मैंने अपने होंठ काटने शुरू कर दिए। मेरे चूतड़ शायद हल्के-हल्के हिलने लगे थे। मुझ पर मस्ती और खुमारी छाने लगी थी। मेरी चूत में भी बहुत सनसनी हो रहा थी और मन कर रहा था कि अभी अपनी उंगली अपनी चूत में डालकर चूत के दाने को रग़ड़ दूँ। मैंने अपनी आँखें बंद कर ली थीं। सब्ज़ी वाला- क्या हुआ माँ साब? चक्कर आ गए क्या? अब उससे क्या बताती कि मैं किस तरह अपने को संभाले हुई हूँ। वाईब्रेटर की स्पीड बहुत ज़्यादा थी और मुझे अब मज़ा आने लगा था। शायद चूत थोड़ी गीली भी हो गई थी। मुझसे नहीं रहा गया मैंने ससुर जी को देखा, वो मेरे पीछे ही थे। मैंने उनका हाथ ऐसे पकड़ा कि लोगों का ज्यादा ध्यान ना जाए और उनके कान में कहा- बाबूजी… प्लीज़ घर चलिए। अब यहा रुका नहीं जा रहा…प्लीज़.. बहुत अजीब सा लग रहा है…! ससुरजी- सब्जी ले ली क्या? मैंने कहा- हाँ… जितनी ले लीं उतनी काफ़ी है…प्लीज़ अब मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा और प्लीज़ इससे बंद कर दीजिए, नहीं तो बाजार में इज़्ज़त खराब हो जाएगी। मेरे कपड़े गंदे हो जाएँगे..! मैंने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि मेरी चूत ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया था और उससे साड़ी भी गंदी हो सकती थी। ससुर जी मेरे कान में बोले- चल ठीक है, चल घर पर, आज तेरी गाण्ड मारूँगा में.! बोल मरवाएगी ना..! 3 दिन से मैंने कुछ नहीं किया है तेरे साथ.. बोल जल्दी…! मैंने कहा- प्लीज़ बाबूजी आपको जो करना है कर लेना… पर अब घर चलो… प्लीज़..! मेरे अन्दर भी आग सी लग रही थी। हम दोनों जल्दी-जल्दी बाजार से आए… बाबूजी ने गाड़ी पार्किंग से निकाली और हम घर की तरफ चलने लगे। मैंने गाड़ी में अपनी आँखें बंद कर ली थीं और मेरा एक हाथ मेरी बाईं चूची पर और एक हाथ अपनी चूत को सहलाने के लिए अपने आप चला गया था। मुझे यह भी ध्यान नहीं रहा कि बाबूजी मेरे साथ हैं, उस वाईब्रेटर से मैं पागल सी हो गई थी। बाबूजी ने मेरी रानों पर हाथ फिराते हुए कहा- बस बेटा… थोड़ी देर और रुक जा घर चल कर तुझे अच्छे से रगड़ूंगा। वो तो अच्छा है कि हमारी कार के शीशे एकदम काले हैं और बाहर से कुछ नहीं दिखता। मैं जैसे-तैसे घर पहुँची और घर पहुँचते ही मैंने अपनी साड़ी उतार फेंकी और बोली- बाबूजी प्लीज़… इसे मेरे अन्दर से निकालो जल्दी… मैं पागल हो जाऊँगी..! ससुर जी बोले- मेरे बेडरूम में चल बहू। वहीं इससे निकालूँगा। मैं फ़ौरन उनके बेडरूम में आ गई। उन्होंने सीधा खड़ा किया। मैं खड़े-खड़े ही उनसे चिपक गई और आँखें बंद कर लीं। उन्होंने मेरे ब्लाउज की डोरियाँ खोल दीं और मेरा पेटीकोट भी उतार दिया। अब मैं उनके सामने ब्रा और पैन्टी में ही थी। उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैं तो पहले से ही आग में जल रही थी। मैंने उनके होंठ चूसने शुरू कर दिए…! मैं एकदम मदहोश हो गई थी। वो एक हाथ से मेरे चूतड़ और दूसरे हाथ से मेरा दायाँ मम्मा मसल रहे थे। फिर उन्होंने मेरी ब्रा भी उतार दी और मेरे चूचुक चूसने लगे। मेरे अन्दर तूफान आ गया, मेरी सिसकारियाँ निकलने लगीं ‘उफफफफ… ओह बाबूजी..!’ उन्होंने बड़े ध्यान से मेरी पैन्टी उतार दी और फिर वाईब्रेटर धीरे-धीरे अन्दर-बाहर करने लगे। उन्होंने उस पर थोड़ा बेबी आयल भी डाल दिया और वो और चिकना हो गया। मैं उनके होंठों को बुरी तरह चूसने लगी। उन्होंने कहा- चल बेटा अब कुतिया बन जा और मेरे बिस्तर पर बैठ जा। उन्होंने जैसा कहा मैंने वैसा ही किया। उन्होंने अपने कपड़े उतार दिए। उनका लण्ड एकदम नाग की तरह फुफकार रहा था। और एकदम कड़क था। वो जल्दी से मेरे पीछे आए और मेरे गाण्ड पर लण्ड का सुपारा रख कर हल्के-हल्के झटके मारने लगे। उन्होंने अपने लण्ड पर भी बेबी आयल लगाया और फिर एक तेज़ झटका दिया और लण्ड पूरा मेरे अन्दर समा गया। ससुर जी- बहू…तेरी गाण्ड तो बड़ी टाइट है…उफ्फ़… बड़ा मज़ा आ रहा है…ओह्ह..! वो मेरी गाण्ड में झटके मारने लगे और मेरा हाथ अपने आप ही मेरी चूत पर चला गया और मैं अपनी चूत के दाने को रगड़ने लगी और सिसकारियाँ लेने लगी। ‘उफ्फ़… ओह.. बाबूजी…प्लीज़…नहीं… ओह..!’ तभी उन्होंने अपना लण्ड मेरी गाण्ड से निकाल कर मेरी चूत में डाल दिया। मैं सच बोलूँ तो मेरा मन भी यही कर रहा था कि उनका लण्ड मेरी चूत में आ जाए क्योंकि गाण्ड में काफ़ी दर्द हो रहा था। उन्होंने बहुत तेज़ झटके मारने शुरू कर दिए। मैंने भी अपने चूतड़ हिला-हिला कर उनका पूरा साथ दिया। ‘उफफ्फ़…ओह… प्लीज़…नहीं…!’ मैं यह सब बोले जा रही थी और मेरी आँखें बंद थीं। वो मेरी चूचियों को भी बीच-बीच में मसल देते थे। ऐसा करीब 20 मिनट चलता रहा और फिर मुझे अपने ऊपर काबू नहीं रहा और मैंने अपना पानी छोड़ दिया। बड़ा ख़ुशगवार अहसास था वो…! मुझे लगा मैं जन्नत में हूँ.. इस समय…! बाबूजी भी हाँफ़ रहे थे। ‘उफफ्फ़.. ओह…बस…!’ और उन्होंने काफ़ी सारा पानी मेरी चूत में छोड़ दिया। हम दोनों बेड पर ही लेट गए। करीब 10 मिनट बाद बाबूजी उठे और बोले- चल बेटा अब घर का काम कर ले..! बहुत काम है। और ड्राइंग रूम में चले गए। मैंने भी अपने कपड़े उठाए, अपनी साड़ी जो ड्राइंग रूम में पड़ी थी, उसे उठाया और अपने रूम में आकर कपड़े पहन लिए। गुसलखाने जाकर फ्रेश हुई और फिर अपने घर के काम में लग गई। सिलसिला चलता रहा ! आपके विचारों का स्वागत है। आप मुझसे फेसबुक पर भी जुड़ सकते हैं। https://www.facebook.com/zooza.ji2
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