अगस्त की एक रात

लेखक : रणजीत लूथरा

यह बात हैं कुछ 12-14 साल पुरानी, तब मैं 19 साल का एक हट्टा- कट्टा नौजवान था।

मैं मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव “सिवामुलिक” में रहता था। हमारे गाँव में हर साल सावन में मेला लगता था और हम सारे दोस्त उस मेले में जाते थे, बहुत मज़े करते थे। मेला काफी प्रसिद्ध था इसलिए आस-पड़ोस के 5-7 गाँव के भी लोग वहाँ आते थे।

मैंने तब तक किसी भी लड़की को चोदा तो क्या नंगा भी नहीं देखा था। मगर हाँ, मेरे दोस्तों ने मुझे किताबों में लड़कियों की नंगी तस्वीरें दिखाई थी। उसमें अनगिनत लड़कियों की तस्वीरें थी, अलग अलग पोज़ेज़ में ! कहीं एक लड़की दो-दो लड़कों के साथ चुदवा रही थी, तो कहीं तीन लड़कियाँ एक लड़के के लौड़े के लिए लड़ रही थी, सभी कुछ सपना सा लगता था और मैं उन्हें देख कर मुठिया मारा करता था।

खैर, उस मेले में जाने का मुख्य तात्पर्य चोदना था, हम हर बार इसी उद्देश्य से वहाँ जाते थे, इस बार भी हम गए।

इस बार का मेला कुछ अलग ही था, इस बार बहुत सी नई दुकानें थी, झूले थे और काफी सुन्दर लड़कियाँ !

एक लड़की मुझे भी भा गई और मैं उसका पीछा करने लगा। वो जहाँ जाती, मैं वहाँ चला जाता, कभी गुबारा लेने तो कभी चूड़ियाँ लेने !

मेरे मामा की भी वहाँ एक चूड़ियों की दूकान थी, वो वहाँ जा पहुंची और भी वहाँ उसके पीछे पीछे मैं भी चला गया।

मुझे आता देख मामा जी ने कहा,” मुन्ना, अच्छा हुआ तू आ गया, आधे घण्टे के लिए दूकान संभाल ! मुझे ज़रा कुछ काम है !

मौका पाकर मैं वहाँ बैठ गया और उसे चूड़ियाँ दिखाने लगा।

उसके गोरे-गोरे हाथ अपने हाथों में लेकर उनमें चूड़ियाँ पिरोने लगा। कभी कोई टाइट चूड़ी से उसे दर्द होता तो वो अपना दर्द अपने होटों को काट कर दर्शाती। यह सब देख-महसूस कर के मेरा तो लौड़ा ही खड़ा हो गया।

मैंने कहा,” आपके हाथ काफी कोमल हैं, मानो रेशम के बने हों !”

और वो शरमा गई। मुझे लगा कि उसे भी मैं अच्छा लगता हूँ।

धीरे धीरे मैं उसका हाथ अपने लौड़े के पास लाते गया, शायद उसने यह महसूस कर लिया और मुझसे कहा,” क्या आप मुझे घर तक छोड़ सकते हैं, रात काफी हो गई है और मेरी सहेलियाँ भी नहीं दिख रही !”

मैं फट से तैयार हो गया, मामाजी आये तो उनसे सायकिल ली और चल पड़ा उसके साथ।

रास्ते में उससे उसका नाम पूछा।

“रति” उसने जवाब दिया।

काफी देर चलने के बाद हम एक सुनसान जगह पर पहुँचे, मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे पास के खेत में ले गया।

उसके होठों को अपने हाथ से छुआ, उन पर शबाब की बूंदें मानो शहद लग रही थी, मैंने हलके से उसके होठों पर अपने होठ रखे और अपनी जबान को उसके मुँह के अन्दर फ़िलाने लगा। उसके हाथ भी मेरे शरीर पर घूमने लगे, कभी वो मेरी गर्दन को चूमती तो कभी मेरे कान को अपनी जुबान से सहलाती।

मेरे अंग-अंग में रोमांच भर गया, मैंने उसकी चोली निकाली तो उसके स्तन बाहर छलक पड़े, उनका आकार बहुत बड़ा था, मेरे हाथ से भी बड़ा !

मैंने एक को मुँह में लिया और चाटने लगा, उसके चुचूक खड़े हो गए। मैं अपनी जुबान से उसके चुचूक के इर्द गिर्द गोला बनाने लगा, उससे उसको बहुत अच्छा लगा “आ…आया…ऊऊओह्ह्ह्ह” की आवाज़ से मेरे लौड़ा पैन्ट फाड़ने को तैयार हो गया।

मैंने उसे नीचे लिटाया, उसका घगरा निकला और फिर उसकी चड्डी। उसकी गोरी गोरी टांगें देखकर तो मेरे मुँह में पानी आने लगा। मैंने जल्दी से अपनी पैन्ट और चड्डी निकली और उसकी चूत चाटने लगा। उसकी चूत में मेरी जुबान अन्दर तक जा रही थी। वो अपना आनंद ” और ….और जोर से …..आह…” की आवाज़ से जता रही थी।

फिर वो हट गई और मुझे लिटा दिया, वो मेरी टांगों की बीच बैठ गई और मेरे खड़े लौड़े को देखने लगी।

” बाप रे ९ इंच ! बहुत बड़ा हैं यह तो ! क्या मेरी चूत में जा पायेगा?”

मैं भी सोच में पड़ गया। मगर उसने मुझे सोचने का वक़्त नहीं दिया, और फट से मेरे लण्ड को अपने गरम होठों के बीच ले लिया, अपने सिर को ऊपर-नीचे करने लगी, लौड़े के सर पर जुबान से गोले बनाने लगी। ख़ुशी के मारे मैं चिल्लाने लगा,” हाँ, हाँ और जोर से…..और जोर से……रति…….रांड और अन्दर ले …”

इतने में मेरा चीक(वीर्य) निकल गया, वो हँस पड़ी, उसने मेरा पूरा चीक खा लिया।

मेरा लौड़ा छोटा हो गया। वो उसे हाथ में पकड़ कर हिलाने लगी, मेरी छाती को चूमने लगी, मेरे चुचूकों को चाटने लगी। वो फिर मेरी गोटियों को अपने मुँह में लेकर खेलने लगी। थोड़ी देर में मेरा लौड़ा खड़ा हो गया।

“चल अब डाल दे !” रति बोली।

मैंने कहा,” मैंने कभी किया नहीं, क्या आप मुझे बताएंगी कि कहाँ डालना है !”

उसने मेरे खड़े लौड़े को अपने हाथ में लिया और अपनी चूत के दरवाज़े पर रख दिया।

“चल अब डाल !” वोह बोली।

और मैंने डाल दिया, थोड़ा सा दर्द हुआ मुझे, पहली बार था ना !

“अब अन्दर-बाहर कर अपने लौड़े को, फिर देख क्या मजा आता है !”

मैं वैसा ही करने लगा, उसके स्तनों को काटने लगा, उसके होठों को चूमने लगा, उसके उभार लाल लाल हो गए थे, उनमें मेरे हाथों के निशाँ भी पड़ गए थे। मैंने अपने धक्कों को गति बढ़ा दी।

” डालो और जोर से डालो, मेरी चूत कब से एक लौड़े के लिए प्यासी थी…. रणजीत… अपने हाथों से मेरी गांड भी दबाओ… !”

मैंने फिर उसके पैर अपने कंधे पर रख लिए और फिर से धक्के देना चालू किया, उसे पैरों को काटता तो कभी चूमता !

मेरे धक्कों के उसके स्तन यूं झूलते मानो आंधी में लालटेन !

” रणजीत, अपने लौड़े की वर्षा से एक बार फिर मेरे चेहरे को नहला दो, जोर से डालो अन्दर……आअह्ह…..ऊऊऊउऊऊऊह्ह्ह्ह्ह्ह……मेरे राजा…..बड़ी तेज़ हैं तेरी गाड़ी…….फाड़ डाल मेरी चूत को………आ …और और और…..हाँ हाय हाँ हाँ हाँ…” वो बड़ी ही रोमांचित थी और मैं भी !

मैं फिर से निकलने वाला था, मैंने अपना लौड़ा बाहर निकाला और उसके मुँह की तरफ रख कर हिलाने लगा … एक-दो बार हिलाने के बाद मेरा पूरा चीक निकल गया,”ओह , आ आ….ले…पूरा ले मुँह में रांड……ले ले मेरे लौड़े को !” मैं बोला।

उसके बाद हमने कपड़े पहने और फिर उसे उसके घर छोड़ दिया।

इस घटना के बाद मैंने कई बार कोशिश की उससे मिलने की, मगर वो कहीं नहीं मिली………

आप बताइए, आपको मेरी कहानी कैसी लगी?

Ananya Verma

अरे! मैं अनन्या वर्मा हूँ - लखनऊ विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान की पढ़ाई करने वाली और पिछले 4 साल से हिंदी में ऐसी कहानियाँ लिख रही हूँ जो आपकी अंगुलियाँ स्क्रीन पर रोक दें। मैं इंसानी इच्छाओं, ख्वाहिशों और वो पलों को समझती हूँ जो आप छुपाना चाहते हैं लेकिन महसूस करना चाहते हैं। मेरी कहानियों में वही बात है जो दिल को छूती है और तन को सिहराती है। हज़ारों पाठकों ने मेरी कहानियाँ पढ़कर गर्म रातों का मज़ा लिया है। तो चलो, आज की रात मेरी कहानी से बनाते हैं!

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