सुधा मैं बोली- जीजाजी उसे ज़्यादा भाव ना दीजिएगा नहीं तो वह जौंक की तरह चिपक जाएगी.. पर जीजाजी वह है बड़ी भली, बस चुदाई के मामले में ही थोड़ी लंगोटी से कमजोर है। “आने दो देखता हूँ.. कमजोर है या खिलाड़ी है..!” चमेली के जाने के बाद साफ-सफाई के लिए हम दोनों बाथरूम में आ गए। मैंने फव्वारा खोल दिया। हम दोनों के नंगे जिस्म पर पानी की फुहार पड़ने लगी। बाथरूम में लगे बड़े शीशे में मैं देख रही थी, फव्वारे के नीचे मेरे उत्तेजक बदन पर पानी पड़ रहा था। मेरे तने हुए मम्मों से टपकता पानी जो पैरों के बीच मेरी बुर से होता हुआ पैरों पर छोटी-छोटी धार बनाते हुए नीचे गिर रहा था। मेरी सुपुष्ट चूचियों से गिरता हुआ पानी आज बहुत अच्छा लग रहा था। जीजा के चौड़े सीने से बहता पानी उनके लौड़े से धार बनाकर बह रहा था, जैसे वे मूत रहे हों। मैंने उनका लण्ड हाथ में ले लिया और सुपारे को खोलने और बंद करने लगी। उनका लण्ड भी मेरे हाथ में आते ही सजग हो गया और मेरी बुर को देख कर अकड़ने लगा। मैंने मदन जीजाजी के नंगे सुपुष्ट शरीर को अपनी छाती से चिपका कर उनके होंठ अपने होंठों में ले लिया। मेरी कसी हुई चूचियाँ जीजाजी के सीने में रगड़ खाने लगीं। मैंने उनके शिश्न को पकड़ कर अपनी बुर से सटा लिया और थोड़ा पैर फैला कर उसे अपने यौवन-द्वार पर रगड़ने लगी। जीजाजी मेरे मम्मों को दबाते और सहलाते हुए मेरे होंठों को चूस रहे थे और उनका लण्ड को मेरी मुनिया अपने होंठों से सहला रही थी। बैठकर नहाने के लिए रखे स्टूल पर मैंने अपना एक पैर उठा कर रख लिया और उनके लण्ड को बुर में आगे बढ़ने का मौका मिल गया। शीशे में दिख रहा उनका लण्ड अन्दर-बाहर होते हुए मेरी प्यारी बुर से खिलवाड़ कर रहा था। मेरी मुनिया उसे पूरा अपने मुँह में लेने की कोशिश कर रही थी। कुछ देर बाद मैं अपने को छुड़ा कर बाथटब को पकड़ कर झुक गई। मेरे चूतड़ उठे हुए थे और मेरा यौवन-द्वार दिखने लगा था। जीजाजी ने उस पर अपने तनतनाए हुए लण्ड को लगा कर धक्का दिया, पूरा लण्ड ‘गॅप’ से बुर में समा गया। फिर क्या था लण्ड और चूत का खेल शुरू हुआ। सामने शीशे में जैसे ब्लू-फिल्म चल रही हो, जिसकी हेरोइन मैं थी और हीरो थे मेरे मदन जीजा। जीजाजी का लण्ड मेरी बुर में अन्दर-बाहर हो रहा था, जिससे बुर बावली हो रही थी पर मुझे शीशे में लण्ड का घुसना और निकलना बहुत ही कामुक लग रहा था। फव्वारे से पानी की फुहार हम दोनों पर पड़ रही थी। हम लोग उसकी परवाह ना कर तन की तपिश मिटाने में लगे थे। जीजाजी पीछे जब मेरी चूचियाँ पकड़ कर बराबर धक्के लगाए जा रहे थे। शीशे में अपनी चुदाई देख कर मैं काफ़ी गरम हो चुकी थी, इसलिए मैं अपने चूतड़ को आगे-पीछे कर गपा-गप लौड़े को बुर में ले रही थी और बोलती जा रही थी, “जीजाजी..! बहुत अच्छा लग रहा है…इस चुदाई में… चोद दो मेरे सनम.. जिंदगी का पूरा मज़ा ले लो …हाय.. ! मेरे चोदू-बलम… तुम्हारा लौड़ा बड़ा जानदार है… मारो राजा धक्का… और ज़ोर से… हाय राजा और ज़ोर से… और ज़ोर से…… हाय..! इस जालिम लौड़े से फाड़ दो मेरी बुर्र्र्र्र्र्र्ररर ब्ब्ब्बबबाहुत अच्छाआआ लगगगग रहा हाईईईईई…!” पीछे से चुदाई में मेरे हाथ झुके-झुके दुखने लगे थे। मैंने जीजाजी से कहा- राजा ज़रा रूको, इस तरह पूरी चुदाई नहीं हो पा रही है, लेट कर चुदने में पूरा लौड़ा घुसता है और झड़ने में बहुत मज़ा आता है..!” मैंने फव्वारे को बंद किया और वहीं गीले फर्श पर लेट गई और बोली- अब ऊपर आ कर चुदाई करो..!” अब जीजाजी मेरे ऊपर थे और मेरी बुर में लण्ड डालकर भरपूर चुदाई करने लगे अब मेरी बुर में लौड़ा पूरा का पूरा अन्दर-बाहर हो रहा था और मैं नीचे से सहयोग करते हुए बड़बड़ा रही थी, “आह.. अब चुदाई का मज्जा मिल रहा है … मारो राजा…मारो धक्का… और ज़ोर से… हाँ..! राजा इसी तरह से… भर दो अपने मदन रस से बुर को… अहह इसस्स्स्स्स्स ओह..! जीजाजी कस-कस कर धक्का मार कर मेरी बुर को चोद रहे थे। थोड़ी देर बाद उनके लण्ड से लावा निकला और मेरी बुर की गहराई में झड़ गए और मैं भी साथ-साथ खलास हो गई। मैं सेफ पीरियड में थी, इसलिए परवाह नहीं थी। कुछ देर पड़े रहने के बाद मैं बुर को साफ कर जल्दी बाहर निकल आई, बाहर आकर बिस्तर को ठीक किया, कमरा व्यवस्थित किया और भाभी के कमरे से एक ब्लू-फिल्म की सीडी लाकर ड्रेसिंग टेबल के दराज में डाल दी। तब तक जीजाजी तौलिया लपेटे कर बाथरूम से बाहर आ गए। वे फ्रेश दिख रहे थे शायद वे साबुन लगा कर ठीक से नहा लिए थे। उन्हें देख कर, “मैं भी फ्रेश हो कर आती हूँ।” कह कर बाथरूम में घुस गई। इसी बीच चमेली चाय लेकर ऊपर आई और कमरे के बाहर से आवाज़ दी, “जीजाजी आँखे बंद करिए.. मैं चाय लेकर आई हूँ..!” मैं बाथरूम से निकल कर बाहर आने वाली थी, तभी सोचा, देखें ये लोग क्या करते हैं। मैं दरवाजे के शीशे के प्रतिबिम्ब से इन दोनों को देखने लगी। जीजाजी बोले- आँख क्यों बंद करूँ..!” चमेली बड़ी मासूमियत से बोली- मैं नंगी हूँ ना..!” जीजाजी बोले- अब आ भी जाओ, सुधा बाथरूम में है.. मुझसे क्या शरमाना..!” चमेली चाय लेकर नंगी ही अन्दर आ गई। इस बार चाय केतली में थी। चाय मेज पर रख कर अपनी चूचियों और चूतड़ों को एक अदा से हिलाया मानो कह रही हो ‘मंगता है तो राजा ले ले… नहीं तो.. मैं ये चली..!’ फिर उसने जीजा जी की तौलिया को खींच लिया। जीजाजी ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वह अपने को छुड़ाती हुए बोली- फिर चाय ठंडी करनी है क्या..!” “सुधा को बाथरूम से आ जाने दे साथ-साथ चाय पिएँगे, तब तक तू दराज से सिगरेट निकाल कर ले आ..!” चमेली ने दराज से सिगरेट और माचिस निकाली एक सिगरेट को अपने मुँह में लगा कर सुलगा दिया और एक लम्बा कश लगा कर सिगरेट को अपनी बुर के मुँह में खोंस कर बोली- जीजाजी अब मेरी बुर से सिगरेट निकाल कर पियो मस्ती आ जाएगी। मदन जीजा ने सिगरेट बुर से निकाल कर उसकी चूत को चूम लिया और फिर आराम से सिगरेट पीने लगे। चमेली बोली- तब तक मैं अपना सिगार पीती हूँ..! यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं ! और उसने मदन के लौड़े को अपने मुँह में ले लिया। मदन ने सिगरेट खत्म होने तक लौड़ा चुसवाने का मज़ा लिया, फिर उसे लिटा कर उसके ऊपर चढ़ गए और अपना लौड़ा उसकी चूत में पेल दिया। पहले तो चमेली तिलमिलाई फिर हर धक्के का मज़ा लेने लगी- जीजाजी आप आदमी नहीं सांड हैं..! जहाँ चूत देखी पिल पड़े… अब जब मेरी बुर में घुसा ही दिया है तो देखूँगी कि तुम्हारे लौड़े में कितना दम है… चोदो राजा चोदो इस बार चुदाई का पूरा सुख उठाऊँगी… हय मेरे चुदक्कड़ जीजा फाड़ कर लाल कर दो इस कमीनी बुर को … और ज़ोर से कस-कस कर धक्का मारो … ओह अहह इसस्स्स्सस्स बहुत मज़ा आ रहा है..!” चमेली जानती थी कि मैं बाथरूम में हूँ इसलिए मेरे निकलने के पहले झड़ लेना चाह रही थी। जब कि मैं बाथरूम से निकल कर इन दोनों की चुदाई का खेल बहुत देर से देख रही थी। चमेली गंदे-गंदे शब्दों का प्रयोग करके जीजाजी को जल्दी झड़ने पर मजबूर कर रही थी और नीचे से चूतड़ उठा-उठा कर मदन के लण्ड को अपनी बुर में निगल रही थी। जबकि जीजाजी कई बार चोद कर झड़ चुकने के कारण झड़ ही नहीं रहे थे। एक बार चमेली झड़ चुकी थी, लेकिन जीजाजी उसकी बुर में लण्ड डालकर चोदे जा रहे थे। मैं उन दोनों के पीछे खड़े हो कर उनकी घमासान चुदाई देख रही थी। मेरी बुर भी फिर से पनिया गई, पर मेरी हिम्मत इस समय और चुदवाने की नहीं हो रही थी इसलिए चमेली को नीचे से मिमियाते देख बड़ा मज़ा आ रहा था। चमेली ने एक बार फिर साहस बटोरा और बोली- ओह माँ..! कितनी ही बार झड़ाओगे मुझे लेकिन मैं मैदान छोड़ कर हटूँगी नहीं… चोदो राजा और चोदो …बड़ा मज़ा आ रहा है… चोदू..ऊऊ ओह बलम.. हरजाई …और कस-कस कर चोदो और ज़ोर से मारो धक्के.. फाड़ दो बुर… ओह अहह इसस्स्स्सस्स हाँ..! सनम आ भी जजाऊऊऊ चूत का कबाड़ा कर के ही दम लोगे क्या..! अऊऊऊ अब आ भी जाओ..!” जीजाजी ऊपर से बोले- रूको रानी अब मैं भी आ रहा हूँ..!” और दोनों एक साथ झड़ कर एक-दूसरे में समा गए। जीजाजी चमेली के ऊपर थे उनका लौड़ा चमेली के बुर में सिकुड़ रहा था, मदन की गाण्ड कुछ फैल गई थी। मैंने पीछे से जाकर जीजाजी की गाण्ड में अपनी चूची लगा दी। जीजाजी समझ गए बोले- क्या करती हो..!” मैंने चूची की नोक से से दो-तीन धक्के उनकी गाण्ड के छेद में लगाए और बोली- अपने चोदू लाल की गाण्ड मार रही हूँ। जहाँ बुर देखी पिल पड़ते हैं..! चमेली जीजाजी के नीचे से निकलती हुई बोली- दीदी मैं भी मारूँगी.. मेरी तुमसे बड़ी है..! सब हँसने लगे। चमेली की चुदाई देख कर मैं गर्म हो गई थी लेकिन मम्मी के आने का समय हो रहा था, फिर चाय भी पीनी थी, इसलिए मन पर काबू करते हुए बोली- अब सब लोग अपने-अपने कपड़े पहन कर शरीफ बन जाइए, मम्मी के आने का समय हो रहा है। फिर हम लोग अपने-अपने कपड़े ठीक से पहन कर चाय की मेज पर आ गए। चमेली केतली से चाय डालते हुए बोली- दीदी देख लो, चाय ठंडी हो गई हो तो फिर से बना लाऊँ। जीजाजी चाय पीते हुए बोले- ठीक है, चमेली इस बार केतली में चाय इसीलिए बना कर लाई थी कि दुबारा चाय गर्म करने के लिए नीचे ना जाना पड़े और दीदी अकेले-अकेले…! जीजाजी चमेली की तरफ गहरी नज़र से देख कर मुस्काराए। “जीजाजी आप बड़े वो हैं..!” चमेली बोली। “वो क्या..!” प्रिय पाठकों आपकी मदमस्त सुधा की रसभरी कहानी जारी है। आपके ईमेल की प्रतीक्षा में आपकी सुधा बैठी है। [email protected]
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